Posts

11 से 20 तक

11 हे मेरे उद्धत कारुण्य! निहत तारुण्य सर्वग्रासी संवेदन किस तरह संतुष्ट होंगे तुम? सभी को चाहिए अर्थ जिस अर्थ का वास्तव में कोई अर्थ नहीं हे मेरे दुर्विनीत दारिद्र्य! सभी चाहते हैं प्रेम कहते कुछ हैं मगर करते कुछ नहीं देते हैं मुझे चरम आघात समुद्र के बीच ग्रेनाइट के पहाड़ की तरह जिस पर टकराती है सारी दुनिया के खूनी आंसुओं की तरंगे फूटती हैं कारुण्य की फुलझड़ियाँ हाय! मैं  एक असहाय संलाप एक तरफा आलाप। प्रीति प्रबुद्ध  प्रलाप।। मैं एक स्तंभिभूत डॉक्टर। रोगी की मृत्यु सुनिश्चित। बचाना मुश्किल। 12 विपदाओं के कोष्ठक बंधनों से मुझे मुक्त करो चकाड़ोला शत्रु के शिविर में मैं बंदी। सामने हत्यारे के बंदूक विभीषिका के मकड़ जाल के ग्राफ में विदग्ध,विषर्ण,विवर्ण का एक बिन्दु हूँ मैं। श्रांत,क्लांत,पराभूत सैनिक मैं, पलायनपंथी। मेरा शरीर, मन, मर्म में और नहीं जो धर्म सब परित्याग कर शरण तुम्हारी आया अब मेरे सारे पाप ताप को मोक्ष दो अब। मैं अब और पश्चाताप ढो नहीं सकता। मेरे लिए अब आप वहन करो प्रभु। आपने तो कहा था अर्जुन को "अहम त्वं सर्व पापेभ्यो मोक्षिष्य...

1 से 10 तक

1  नया आर्कमिडिज़ मैं। बड़दांड की धूल से रचता हूँ चकाडोला की ज्यामिति। अहंकारी आईएएस, मंत्रहीन मंत्री, यंत्र न जानने वाले यंत्री और कुसंवादी संवाददाता मुझे चाहते है कैद करना। इंतजार करो थोड़ा।  अभी चकाडोला की ज़्यामिति मेरी पूरी नहीं हुई। आगामी मादक महोत्सव में  बोतल की झांझ बजाते उमर खय्याम के गाना गाते  न जिनमें दिमाग या दुख। मगर वे मुझे धक्का देते हैं। रक्त के आंसुओं को पोंछते-पोंछते  मैं पूछता हूँ इतने पैसे नहीं है कि नशा उन्मूलन   कर रोग खरीदते हो? उन्होंने दिया जबाब मानो वे हो नवाब, “हम काले बाजार की बार लाइट है। कील गाड़ने वाली सनलाइट। ऑफिसर के हुक्म के पतदार हैं हम। क्षमता और धन हमारे रोम-रोम में। इसमें तुम्हारे बाप का क्या गया? क्या वह मर गया?” “बाप मर गया है तो! इस मर्मांतक घाव को वह ठीक करेगा, तुम पर अवश्य हसेंगे, करुणा के डाक्टर खाने।" “साले! बात नहीं मानने वालों को टूटी बोतल से मारो। उसके कलेजे को निश्चेत कर। उसकी पीठ को काला कर। उसके विवेक की हत्या करो। “हे बंधु, बाबू, आपके कीमती चेहरों पर बिखरे मेरे क...

आमुख

आमुख मेरी कविताएं ही मेरा आमुख है। मैं पिंड से ब्रह्मांड में विचरण कर फिर लौट आता हूँ । सन 1949 से मैंने लिखना शुरू किया था। लेखन में मेरी माँ , पत्नी , सगे-संबंधी , घटना , दुर्घटना , मेरे छात्र-छात्रियाँ , बेटे-बेटियाँ , मेरे मित्र , मेरे शत्रु , सभी मेरे प्रेरणा के स्रोत बने हें। 1957 से 1962 के बीच विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में मेरी कविताएं प्रकाशित हुई थी। जब मेरी नीरवता कछुए की भांति मंद गति से सभी स्मृतियों का मन ही मन याद करता हूँ तो मैं रोमांचित हो उठता हूँ। मेरे पास आनंद का कोई उद्वेग नहीं है। मेरा मन दुख में चक्कर काटते गहराता जाता है। मेरे बड़े मामा वेदांती थे। उनसे छोटे वाले मामा कृष्ण भक्त थे। मेरे बचपन के दिनों की कविताओं में किशोर कृष्ण , किशोरावस्था में परमब्रह्म , युवावस्था में जगन्नाथ की वंदना मिलती है , मगर प्रौढ़ावस्था में मेरे अहंकार को परमब्रह्म ने धूल-धूसरित कर दिया। मेरे वार्धक्य के गीता के विश्वरूप मेरे साधना के आराध्य है। मेरे पिताजी तालचेर के आग्नेय स्वाधीनता संग्रामी थे। ढेंकानाल के जीवन-जंजाल में फँसकर अपने आप को उन्होंने दबाकर रखा। मेरे रगों में ...

भूमिका

समर्पण ग्रीक दार्शनिक एंपीडोकलस के कथन “God is a Circle whose centre is everywhere and circumference is nowhere”तथा विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन के ऊर्जा-संहति सूत्र को चरितार्थ करते भारतीय दर्शन में अणु,परमाणु,जीवाणु,स्नायु-तंत्र,बाहरी रूपरेखा से लेकर आंतरिक जगत के सौंदर्य-बोध,आत्मा का देश,तृष्णा, अनंत आकांक्षाएँ,प्रीति,प्रत्यय और विवेक को जागृत करने वाले विश्व-नियंता जगन्नाथ के प्रतीक ‘चकाडोला’ के समक्ष साष्टांग समर्पण के साथ-                                                            -दिनेश कुमार माली भूमिका तालचेर के प्रख्यात कवि विरंचि महापात्र के अद्यतन कविता-संग्रह "चकाड़ोला की ज्यामिति" को ‘प्रबंध-काव्य’ की श्रेणी में गिना जाए तो इस कथन में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस संग्रह में संकलित 68 कविताएं चकाड़ोला पर ही आधारित हैं। 'चकाडोला’ अर्थात् चक्र जैसी गोल आँखों की पुतल...